विकास की विभिन्न अवस्थाएँ ,मानव विकास की अवस्थाएं ,शैशवावस्था, बाल्यावस्था,किशोरावस्था,प्रौढ़ावस्था

प्रत्येक बच्चे का विकास एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नामकरणीय प्रक्रिया है, जिसमें उन्हें अनेक अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। इस लेख में हम विकास के विभिन्न अवस्थाओं के बारे में जानेंगे |ये अवस्थाएं उनके जीवन में विभिन्न पहलुओं और क्षेत्रों का संचार करती हैं, जिनसे वे विभिन्न कौशल, गुण और विचारशीलता विकसित करते हैं।

परिभाषा 

बाल विकास को व्यक्तिगत ढंग से समझने के लिए विभिन्न आयु के अनुसार अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों द्वारा दिया गया अवस्था या कालखंड को ही बल विकास की अवस्था कहते हैं  |

परिचय 

भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा विकास कल को गर्भ काल से परिपक्वता की ओर प्राप्ति तथा उनकी विशेषताओं के अनुसार उन्हें अलग-अलग अवस्थाओं में विभाजित किया गया है | विकास की यह अवस्थाएं अपने आप में अद्वितीय स्थान रखता है |

अवस्थाएं 

वैज्ञानिकों द्वारा मुख्य रूप से बाल विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है जो निम्न है

  1. गर्भावस्था
  2. शैशवावस्था
  3. बाल्यावस्था (प्रारंभिक व उत्तर)
  4. किशोरावस्था

गर्भावस्था

गर्भावस्था की समय अवधि गर्भधारण से 40 सप्ताह या 280 दिन तक होती है | यह अवस्था गर्भधारण से जन्म के समय तक मानी जाती है| यह अवस्था बाल विकास की प्रारंभिक अवस्था है| बाल विकास का आरंभ गर्भावस्था से ही होता है | इस अवस्था के पश्चात अन्य अवस्थाओं का विकास होता है | मानव विकास का प्रारंभ गर्भावस्था से होता है| इस अवस्था में विकास की गति अन्य अवस्थाओं से तीव्र होती हैं | समस्त रचना ,भर और आकार में वृद्धि तथा आकृतियों का निर्माण इसी अवस्था में होता है | इसमें होने वाले परिवर्तन मुख्यतः शारीरिक ही होते हैं।

गर्भाधान से लेकर शिशु के जन्म तक की प्रक्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है |

  1. डिम्ब  अवस्था (The Period of Ovum)
  2. भ्रूणावस्था (The period of Embryo)
  3. गर्भस्थ शिशु अवस्था (The Period of Fetus)

डिम्ब  अवस्था (The Period of Ovum)

इस अवस्था को बीजावस्था भी कहते हैं | इस अवस्था की समय अवधि गर्भधारण से दो सप्ताह (o से 14 दिन) तक होती है | इस अवस्था में गर्भस्थल जीव अण्डे के आकार का होता है, यही जाइगोट कहलाता है। इसके अंदर निरंतर कोशिका विभाजन की क्रिया चलती रहती है किंतु ऊपर से इसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आता |

भ्रूणावस्था (The period of Embryo ) 

यह गर्भकालीन विकास की दूसरी अवस्था है। इस अवस्था की समयावधि तीसरे सप्ताह से दो माह (15 से 60 दिन) तक होती है।समस्त शरीर रचना, आकार, आकृतियों का निर्माण इसी अवस्था में होता है। शरीर के सभी अंगों का विकास इसी अवस्था में होता है।

गर्भस्थ शिशु अवस्था (The period of Fetus ) –

यह गर्भकालीन विकास की तीसरी और अंतिम अवस्था है। इसकी समयावधि तीसरे माह के प्रारंभ से जन्म लेने के पूर्व तक (61 दिन से जन्म तक) होती है। यह अवस्था निर्माण की नहीं अपितु विकास की अवस्था होती है। भ्रूणावस्था में जिन अंगों का निर्माण हो गया होता है उन्हीं अंगों का विकास इस अवस्था में होता है।

क्र गर्भस्थ शिशु समय शिशु का क्रियाकलाप
1. चार सप्ताह में हृदय का धड़कना प्रारंभ
2. 7 सप्ताह में गर्भाशय में गति वह हलचल प्रारंभ
3. 14 सप्ताह में छींकना व खांसना (मूल प्रवृत्ति) प्रारंभ (समर्थक – मैकडुगल)
4. 3 माह में आंख और मस्तिष्क का निर्माण
5. 5 माह में सिर पर बाल निकलना प्रारंभ
6. 7 माह में सपने देखना प्रारंभ (समर्थक – जे. एस. रोस)
7. 40 सप्ताह (280 दिन) पूर्णतः विकास

 

शैशवावस्था (Infancy) 

यह अवस्था जन्म से 5/6 वर्ष की आयु तक होती है इस अवस्था में नवजात शिशु का भार 7 पाउंड होता है। मानव जीवन की पहली व आधारभूत अवस्था , अतार्किक चिंतन की अवस्था , खिलौने की अवस्था , बड़ों पर निर्भरता की अवस्था , सबसे तीव्र वृद्धि और विकास की अवस्था  , भावी जीवन की आधारशिला,  सीखने की आदर्श अवस्था होती  है |शैशवावस्था में बच्चों के क्रियाकलाप मूल प्रवृत्यात्मक होते हैं| भूख लगने पर शिशु का रोना और सामने पड़ी किसी भी वस्तु को मुंह में रख लेना आदि | शैशवावस्था के प्रारंभिक 3 वर्षों में शिशु का तीव्र विकास होता है| आंतरिक अंग इंद्रिय एवं मांसपेशियों का क्रमिक रूप से विकास होता है| इस अवस्था में स्मृति ,कल्पना, ध्यान संवेदना आदि में तीव्र विकास होता है |

शैशवावस्था की विशेषताएं

इस अवस्था में शिशु की तीन वर्ष की आयु तक लगभग सभी मानसिक शक्तियां कार्य करने लगती है। जन्म के पश्चात कुछ समय तक शिशु पूर्ण रूप से दूसरों पर आश्रित रहता है। इस समय शिशु को शारीरिक आवश्यकताओं के साथ ही प्रेम और सहानुभूति पाने के लिए दूसरों के ऊपर निर्भर रहता है | इस समय शिशु माता-पिता एवं भाई-बहन का प्रेम प्राप्त करना चाहता है। इस समय शिशु चाहता है कि इन सभी के द्वारा प्रेम केवल उसे ही मिले, किसी अन्य को नहीं। इस समय शिशु को स्वयं के अलावा किसी अन्य को प्रेम मिलने पर उसे दूसरे से ईर्ष्या होने लगती है।3 से 4 वर्ष की शिशु की कल्पना में ज्यादा सजीवता होती है। इस अवस्था में शिशु में उचित-अनुचित एवं सही-गलत जैसे बालों का ज्ञान नहीं होता। शिशु उन्ही कार्यों को करना चाहता है जिसे करने में उसे आनंद मिलता है। इस अवस्था में शिशु में दोहराने की प्रवृत्ति अधिक प्रबल होती है। शिशु में शब्दों और गतियों को दोहराने की प्रवृत्ति विशेष रूप से विद्यमान रहती है। शिशु में जिज्ञासा की प्रवृत्ति इस अवस्था में प्रबल होती है। वह अपने खिलौने में तरह-तरह का प्रयोग करता है। वह खिलौनों को फर्श में फेंककर या उसके भागों को अलग-अलग देखता है।

बाल्यावस्था (प्रारंभिक व उत्तर)

बाल्यावस्था वह अवधि है जो 3 से 12 वर्ष की उम्र तक चलती है। इस अवस्था में बच्चों में कई अनूठे परिवर्तन होते हैं, जिस कारण इसे एक विकास की दृष्टि से जटिल अवस्था माना जाता है। मनोवैज्ञानिक इसे जीवन का विशेष समय मानते हैं। इस अवस्था में सामाजिक विकास की अधिकतम गति होती है। बच्चों में नैतिकता का विकास भी होता है, जिससे वे सही और गलत का निर्णय ले सकते हैं। बच्चा आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ परिपक्व भी होने लगता है। इस अवस्था में मित्र बनाने की इच्छा प्रबल होती है। बाल्यावस्था में अपने समूह के प्रति बड़ी ही आस्था होती है, जिसमें आपसी सहयोग, प्रेम, और सहानुभूति का भाव विकसित होता है। बाल्यावस्था में बहुत प्रकार की रुचियां भी विकसित होती हैं।

बाल्यावस्था की विशेषताएं

  1. जिज्ञासा की प्रबलता
  2. आरंभिक विद्यालय की आयु
  3. मानसिक योग्यता में वृद्धि
  4. गंदी  आयु
  5. विकास में स्थिरता
  6. समाहुकिता की भावना
  7. रचनात्मक कार्यों के प्रति रुचि
  8. समूह एवं खेलों में सहभागिता
  9. सहयोग की भावना
  10. बहुमुखी व्यक्तित्व का निर्माण
  11. अनोखा काल
  12. संवेगों पर नियंत्रण
  13. उद्देश्य रहित कार्य करने की प्रवृत्ति
  14. वास्तविक जगत से संबंध
  15. परिवर्तनशीलता
  16. तर्कसंगत विचार
  17. हठी  प्रवृत्ति
  18. मिश्रित और बहू स्तरीय विकास
  19. अभिवृद्धि में स्थिरता
  20. आत्मनिर्भरता की भावना

मनोवैज्ञानिकों का मत

ब्लेयर जॉन्स एवं सिंपसन के अनुसार बाल्यावस्था वह समय है, जब व्यक्ति के आधारभूत दृष्टिकोण व मूल्यों और आदर्शों का बहुत सीमा तक निर्माण होता है ।

शैक्षिक दृष्टिकोण से जीवन चक्र में बाल्यावस्था से अधिक कोई महत्वपूर्ण अवस्था नहीं है, जो शिक्षा की अवस्था से बालकों को दिशा देते हैं, उन्हें बालकों का उनकी आधारभूत आवश्यकताओं का उनकी समस्याओं एवं परिस्थितियों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए, जो उनके व्यवहार को रूपांतरित और परिवर्तित करती है।

  1. कोल एवं ब्रूस के अनुसार :- वास्तव में माता-पिता के लिए बाल विकास की आवश्यकता को समझना कठिन है।
  2. किल पैट्रिक के अनुसार :- बाल्यावस्था जीवन का निर्माण काल है।
  3. कोले के अनुसार :- बाल्यावस्था जीवन का अनोखा काल है।
  4. रॉस के अनुसार :- बाल्यावस्था मिथ्या परिपक्वता का काल है।

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास

इस अवस्था में शारीरिक विकास तेजी से होता है इसके बाद के वर्षों में गति मंद हो जाती है। इसी अवस्था को परिपाक काल कहते हैं ।इस अवस्था में लंबाई लगभग 5-7 सेमी. प्रतिवर्ष की गति से बढ़ती रहती है।बाल्यावस्था के प्रारंभ में जहां बालकों की लंबाई बालिकाओं की लंबाई से लगभग 1 सेमी. अधिक होती है | वहीं इस अवधि की समाप्ति पर बालिकाओं की औसत लंबाई बालकों की औसत लंबाई से लगभग 1 सेमी. अधिक हो जाती है |  बाल्यावस्था के दौरान बालकों के भार में काफी वृद्धि होती है।9 से 10 वर्ष की आयु तक बालकों का भार बालिकाओं के भार से अधिक होता है |बाल्यावस्था में सिर के आकार में परिवर्तन होता रहता है।बाल्यावस्था के अंत तक मस्तिष्क का भार प्रौढ़ मस्तिष्क के भार का लगभग 95 प्रतिशत रहता है।।5-6 वर्ष की में बालकों के स्थायी दांत निकलना प्रारंभ हो जाते है।16 वर्ष की आयु तक लगभग सभी स्थायी दांत निकल आते हैं।बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या एवं दृढ़ता दोनों में वृद्धि होती है।इस अवस्था में बालक मांस-पेशियों पर पूर्ण नियंत्रण करने लगता है।बाल्यावस्था में मांस-पेशियों का धीरे-धीरे विकास होता जाता है।

 बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास –

ईर्ष्या – इस अवस्था में बच्चे के मन में ईर्ष्या और द्वेष की भावना विकसित हो जाती है। बच्चे अपने दोस्तों या भाई-बहनों पर झूठे आरोप लगाते हैं, उनकी निंदा करते हैं और उन पर व्यंग्य भी करते हैं। इस अवस्था में बच्चे का अधिकार छीन जाता है, जिससे वह अपने समूह के अन्य बच्चों को अपने से बेहतर मानता है। इस अवस्था में बच्चे में ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है। शैशवावस्था की तुलना में अधिक भय भी होता है। इस अवस्था में बच्चों के साथ भविष्य का परिणाम भी होता है। इस अवस्था में बच्चे को परीक्षा परिणाम में अच्छे अंक नहीं मिलने के कारण या घर के कामों में ध्यान नहीं देने के कारण शिक्षकों द्वारा दिए गए दंडों और सजा के भय का अनुभव होता है। इस अवस्था में बच्चे को स्कूल, परिवार और समाज द्वारा बनाए गए अनुशासन संबंधी नियमों के कारण अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाने के कारण निराशा महसूस होती है। बाल्यावस्था में बच्चे की उत्सुकता और जिज्ञासा बढ़ जाती है, जिससे वह अपने चीजों के प्रति प्रश्न पूछने लगते हैं। इस अवस्था में बच्चे को अपने कामों के प्रति ईर्ष्या या अनावश्यक आलोचना करने पर क्रोध की भावना होती है। बाल्यावस्था में बालक उन रिश्तों से अधिक स्नेह व्यक्त करता है जिनके साथ वह रहना चाहता है।बालक अपने प्रिय वस्तु मिलने पर संबंधित लोगों के प्रति स्नेह प्रकट करता है।

संवेगात्मक विकास के संबंध में मनोवैज्ञानिकों का मत

संवेगात्मक विकास के संबंध में मनोवैज्ञानिकों का मत यह है कि बाल्यावस्था में बच्चे को संवेगात्मक अनुभवों का संवेदनशीलता के साथ सामना करने का मौका देना चाहिए। इससे उनकी सामाजिक, भावनात्मक, और मानसिक विकास में सुधार होता है। यह उन्हें स्वतंत्रता का अहसास कराता है और उनकी सोचने की क्षमता को बढ़ाता है। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि संवेगात्मक विकास बच्चों की स्वास्थ्य, समृद्धि, और खुशहाली के लिए आवश्यक है।

अनुनार इन्होनें बाल्यावस्था को संवेगात्मक विकास का अनोखा काल कहा है।

  1. कोल तथा ब्रूस के अनुसार इन्होंने बाल्यावस्था का संवेगात्मक विकास का अनोखा काल कहा है 
  2. जेम्स ड्रेवर के अनुसार संवेग शरीर की वह जटिल दशा है जिसमें श्वास नदी तंत्र ग्रंथियां मानसिक स्थिति उत्तेजना अवरोध का अनुभूति पर प्रभाव पड़ता है तथा पेशियां निर्दिष्ट व्यवहार करने लगते हैं |
  3. पी.वी. यंग के अनुसार संवेग समस्त व्यक्ति के उदगमिता उत्पन्न करता है और इनका स्रोत मनोविज्ञान है वह इसमें व्यवहार तथा चेतना का अनुभव एवं अतिरिक्त क्रियाकलाप सम्मिलित है |

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण स्तर होता है। इस अवस्था में बच्चे अपने परिवार, स्कूल, और समाज के साथ संवाद करके सामाजिक सांघिक और सहयोगी भावनाओं को समझना शुरू करते हैं। उन्हें समाज में अपनी जगह का एहसास होता है और सामाजिक संबंधों को सुधारने के लिए कौशल विकसित करने का मौका मिलता है। इस रूप में, सामाजिक विकास उनकी व्यक्तित्व और समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान करता है।

पूर्व बाल्यावस्था और उत्तर बाल्यावस्था में अंतर

प्रारंभिक बाल्यावस्था उत्तर बाल्यावस्था
6 से 9 वर्ष के बीच की आयु को पूर्व बाल्यावस्था कहा जाता है 9 से 12 वर्ष के बीच की अवस्था उत्तर बाल्यावस्था कहलाता है
संपूर्ण बाल्यावस्था के पहले आधे वर्ष को पूर्व बाल अवस्था में रखा गया है संपूर्ण बाल्यावस्था के पक्ष के आधे वर्ष को उत्तर बाल्यावस्था में रखा गया है
इस अवस्था में बालक के लिए माता-पिता तथा भाई बहन एक मुंह का निर्माण करते हैं और इस समूह में रहते हुए ही बालक विभिन्न व्यवहारों को सीखता   है | इस अवस्था में बालक मां-बाप की सहाय से बाहर निकाल कर अपने साथ ही बालकों की संगति को पसंद करता है इसी कारण से इस काल को परिपालक कल कहा रहते हैं

 

किशोरावस्था

यह अवस्था 12 – 13 वर्ष से 18-19 वर्ष की आयु तक होती है | इसे अमूर्त चिंतन की अवस्था , समूह भक्ति की अवस्था , विरोध की अवस्था , उलझन की अवस्था , सबसे कठिन कल , संघर्ष और तूफान की अवस्था , टीनएज , संवेगात्मक परिवर्तन की अवस्था , स्वर्ण काल , अपराध प्रवृति के विकास की नाजुक अवस्था , तनाव और क्रोध की अवस्था , अत्यधिक दबाव और तनाव की अवस्था कहा जाता है | इस अवस्था में बालक को स्वयं पर ज्यादा विश्वास रहता है | किसी अन्य व्यक्ति या माता-पिता के बातों को अनदेखा कर स्वयं द्वारा कार्य को पूरी लगन से करते हैं | इस अवस्था में बालक में विद्रोह की प्रवृत्ति अधिक होती है | इस अवस्था में इतना परिवर्तन होता है जो मानसिक शक्ति को प्रभावित करता है | इस अवस्था में बालक किसी प्रकार के जातिगत भेदभाव को नहीं मानता है | इस अवस्था में बालक अपने लक्ष्य को लेकर निष्ठावान हो जाते हैं |

किशोरावस्था की विशेषताएं

  1. स्वयं पर विश्वास
  2. विद्रोह की भावना
  3. आक्रोश की प्रवृत्ति
  4. भेदभाव एवं रूढ़िवादिता से दूर
  5. लक्ष्य के प्रति सचेत
  6. समूह के सक्रिय सदस्य
  7. उत्सुकता एवं उदासीनता
  8. नायक पूजा और संवेदनाएं
  9. वयस्कता  के संक्रमण की पहल
  10. सुविधा और स्वयं से सरोकार

मनोवैज्ञानिकों का मत

स्टैनले हॉल के अनुसार यह संघर्ष तनाव , तूफान, विरोध की अवस्था है जो अत्यधिक समायरात्मक हलचल होने के कारण इस अवस्था को समस्यात्मक अवस्था के नाम से भी जाना जाता है |हाल का सिद्धांत किशोरी के मनोवैज्ञानिकों से संबंधित व्याख्या करता है |

रस के अनुसार -किशोरावस्था शैशवावस्था की पुनरावृति है

किशोरावस्था में शारीरिक विकास 

बालक लगभग 18 वर्ष की आयु तक अपने अधिकतम लंबाई को प्राप्त कर लेता है | बालिकाएं लगभग 16 वर्ष की आयु तक अपने अधिकतम लंबाई प्राप्त कर लेती है | इस अवस्था में शहर तथा मस्तिष्क का विकास जारी रहता है परंतु गति धीमी हो जाती है | 16 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क तथा शरीर का पूर्ण विकास हो जाता है | इस अवस्था में बालक मानसिक परिपक्वता के शिखर पर पहुंचने का प्रयत्न करता है | इस अवस्था के प्रारंभ के पहले ही लगभग सभी स्थाई दांत निकल आते हैं | इस अवस्था में दृणीकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है | उसके परिणाम स्वरुप अस्थाईयों का लचीलापन समाप्त हो जाता है | एक वयस्क में कुल 206 हड्डियां होती हैं | इस अवस्था में मांसपेशी का विकास तीव्रता से होता है | बालक के कंधे और वक्ष  चौड़े हो जाते हैं | इस अवस्था में अंगों की वृद्धि होती है | गले के थायराइड ग्रंथि के विधि होने के कारण बालक बालिकाओं के आवाज में बदलाव होता है|

किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास

इस अवस्था में समय आत्मक व्यवहार में अनेक परिवर्तन आते हैं वास्तव में किशोरावस्था का आगमन समयात्मक व्यवहार में आए से पता लगता है | इस समय जीवन अत्यधिक भाव प्रधान होता है| जिसमें दया प्रेम क्रोध समानुपाती सहयोग आदि प्रवृत्तियां सम्मिलित होती है | इस अवस्था में होने वाले समय आत्मक विकास के अवलोकन से स्पष्ट है कि किशोर में क्रियाशीलता की प्रवृत्ति अधिक होती है जिसके परिणाम तक इस अवस्था में संवेग अधिक होने से क्रिया क्रोध बढ़ जाता है |

प्रौढ़ावस्था

प्रौढ़ावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यावहारिक जीवन की गतिविधियाँ होती हैं। यह वह समय होता है जब व्यक्ति परिवारिक और गृहस्थ जीवन की असलीता में जीने लगता है। इस अवस्था में, कल्पनाएं नहीं रहतीं, बल्कि वास्तविकता की क्रियाएँ होती हैं। व्यक्ति स्वतंत्रता का अनुभव करता है और अपने विशिष्ट क्षेत्र में कौशल दिखाता है। इस अवस्था में, उसे विभिन्न प्रकार के संघर्ष और समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और उसे विभिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों का सामना करना पड़ता है। इस अवस्था में, सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्र के विकास की उत्कृष्ट अवस्था होती है, और सबसे अधिक विकास भी इसी अवस्था में होता है।

 

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